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निचोड़

                                                            आमुख :- विचार शून्यता, खामोशी और कोलाहल की स्थिति में भी कुछेक भाव या उसकी स्फुरणा मानस पटल और हृदय की धड़कनों पर अचानक से नृत्य करने लगते हैं। इनसे निपटने की एक ही युक्‍क्ति तब दिखती है; वह है इनको न्यूनत्तम शब्दों में मूर्त रुप देना यानि लिपिबद्ध करना। उक्त भाव या स्फुरणा की उपयोगिता, प्रासंगिकता और विशेषता पर ऐसे में ज्यादा विचार करने का न ' स्कोप' रहता है और न ही 'जस्टीफिकेशन '। विगत्‌ तीन बरसों से यूँ ही लिखने मैं निमग्न रहा। अब जब इसे एक पुस्तक के रुप में छपवाने चला तब इसके आकार प्रकार को आकर्षक बनवाने के क्रम में जहाँ जिस तरह की गुंजाइश दिखी वहाँ काँट-छाँटकर आपके सन्मुख परोस रहा हूँ। इस पुस्तक में जितने भी लेख हैं सारे के सारे अलग रंग-रुप वाले है; एक दूसरे से कहीं भी मेल नहीं दिखता। इनमें मैं विशेष सजावट करता भी कैसे ? बस उनकी मूल प्रकृति में ...

रिश्ते नाते

                                                  आमुख :- सुनते आ रहा हूँ कि हरेक रिश्तें का मूलाधार प्यार पर टिका है। समय के साथ सबकुछ बदलता है। आज रिश्तों में भी वह निःशर्त और निःस्वार्थ प्यार लापता सा हो गया है। आज तो यहाँ भी करार, टकरार और अस्वीकार रिश्तें के पीयूष रुपी प्यार के बीच बाधा बन खटकने लगे हैं। मानो आज सब बोझ सा बन गया है बस हमसब इसे मजबूरन ढोये जा रहे हैं। मैं मानता हूँ यह स्थिति बदलनी चाहिए । एक बार इस संकट पर विचार करना होगा। मुझे ऐसा लगा रिश्तें-नातें पप कुछ लिखूँ और बस लिखना शुरु किया। यह मेरी इस श्रृंखला की पहली पुस्तक हैं । अभी तो काफी रिश्तें हैं जिस पर लिखना जरुरी है। मैं बचपन से पचपन तक रिश्तों को जिस रुप में देखा हूँ, महसूस किया हूँ, भोगा हूँ और इन्हें जिया हूँ बस उन्हीं अनुभवों, भावों और संवेगों को शब्द की लड़ियों में पीरो कर परोस रहा हूँ। पाठकगण अपनी प्रतिक्रिया देने के लिए स्वतंत्र हैं । मेरी उनसे ऐसी अपेक्षा र...

सबरस

आमुख :- एक बार मेरे दिमाग में आया कि अगर सबरस को एक पात्र में ढाल दिया जाय तो बड़ा अनर्थ हो जायेगा। फिर तो खट्टा, मिठा, कसैला सब अपना मूल रस खो देगें। पर मेरी इस कविता संग्रह में सबरस एक साथ होते हुए भी अपना पृथक-पृथक सहअस्तित्व बनायें रख पाने में सक्षम हैं क्यों कि प्रत्येक रस की कविता अपने ठोस आधार पर टिकी हैं। भले एक पात्र में हों पर अपनी पात्रता में ये कविताएँ दाग नहीं लगने दे रही हैं। मेरा यह दृढ़ विश्वास है। इस कविता संग्रह में देशभक्ति, प्रकृति, मानबी भाव की विभिन्न छाया, श्रृँगार-विरह वेदना-व्यथा के दर्शन होगें। हरेक मूड की परछाई की ताजगी से लबालब ये कविताएँ सुधि पाठकों को तरोताजा करने का दम रखती हैं। वैसे अंतिम निर्णय और फैसला तो आप ही करेगें। अपनी रची कविताएँ हैं, पुत्रवत स्नेह करने के हक और फर्ज से मुझे न रोके। मेरी इस उक्ति को दम्भ न समझें। आपके सुझाव, प्रतिक्रिया और प्रेरणा की अपेक्षा मन में सँजोये लेखनी को थम कराता हूँ। बिदा लेता हूँ।                                    ...

शिवोहम

  आमुख :- ऐसा दावा करना उचित न होना कि मैंने अध्यात्म जगत को समझ लिया और ज्ञानप्राप्ति उपरांत प्रसाद वितरण स्वरुप “शिवोहम्‌'' पाठकों के समक्ष पेश कर रहा हूँ। '“शिवोहम्'' कविता – संग्रह ऐसा दावा पेश नहीं करता | इतना अवश्य कहूँगा मेरा इस दिशा में विनम्र प्रयास का ही शिवोहम् कविता संग्रह एक नतीजा है। “अध्यात्म!” अपने आपमें गहन विषय है और उस संबंध में आज तक शायद ही कोई अंतिम निर्णय पर पहुँचा हो । हाँ, भाव जगत में मेरी अनुभूति, संवेग, विचारों के ऊहापोह से जो कुछ निकला और मैं जितना सँजो पाया हूँ उसी को परोस रहा हूँ । यहाँ समाधान और इसके पथिकों के लिए कोई “'रोडमैप '' भी नहीं है। प्रश्नों की भरमार है और हर कविता में इसके दर्शन सुधिपाठकों को मिलते रहेंगे। इन कविताओं के पठन-पाठन हेतु समय और मनोयोग आप अगर दे पायें तो रस अवश्य मिलेगा। आपको मेरी कविताएँ निराश नहीं करेगी । ऐसी मेरी उम्मीद है पर निर्णय आप पर छोड़ रहा हूँ। अपनी बातों में मैं आपको क्यों उलझाऊँ ? आप स्वयं आजमायें । आपकी प्रतिक्रिया से मुझे प्रेरणा मिलेगी । इसे पाथेय बना कोई ऐसी ही साहित्य की विद्या को लेक...